अरबपतियों पर ज्यादा टैक्स लगाने के लिए अमेरिका, चीन का हवाला देना इसलिए गलत

अतुल ठाकुर, नई दिल्लीसरकार हर साल अरबों में कमाने वालों पर ऊंची दर से टैक्स लगाने का बचाव अमेरिका, चीन में ऊंची दरों के टैक्स का हवाला देकर कर रही है, लेकिन सचाई यह है कि अमेरिका, चीन में सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर जितना खर्च करती हैं, उसके मुकाबले भारत की स्थिति बहुत खराब है। यह सही है कि दुनिया के कई देशों में अति धानढ्य (सुपर रिच) वर्ग से भारत के मुकाबले ज्यादा टैक्स वसूला जाता है। भारत सरकार इसी का हवाला देकर इस बजट में सुपर रिच क्लास पर टैक्स बढ़ाने की घोषणा का बचाव कर रही है। हालांकि, सरकार यह नहीं बताती है कि जिन देशों में सुपर रिच पर टैक्स की दरें अधिक हैं, उनमें से ज्यादातर में गुणवत्तापूर्ण मुफ्त और स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने पर भारी-भरकम खर्च सरकारें उठाती हैं। इस मामले में भारत उनके सामने कहीं नहीं टिकता। शिक्षा: कहां यूके-यूएस, कहां भारत वैश्विक अनुभव बताते हैं कि किफायती गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं एवं शिक्षा व्यवस्था की गारंटी ही गरीबी दूर करने और समाज में समानता लाने की दिशा में उठाए गए सबसे प्रभावी कदम होते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत इन दोनों मोर्चों पर बुरी तरह असफल है। यूके गवर्नमेंट की वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों (प्राइमरी ऐंड सेकंड्री स्कूल्स) के कुल 87.4 लाख विद्यार्थियों में 91.3% का दाखिला सरकारी स्कूलों में था। उसी वर्ष अमेरिकी सरकार का आकलन है कि वहां के कुल 5.7 करोड़ स्कूल स्टूडेंट्स में 89.6% सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहे थे। भारत में सरकारी शिक्षा व्यवस्था चौपट वर्ल्ड बैंक के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2016 में फ्रांस में 15% और कनाडा में सिर्फ 9% छात्र निजी प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे थे। भारत में यह आंकड़ा 33% था। वहीं, माध्यमिक स्तर की बात करें तो 25% फ्रेंच स्टूडेंट्स प्राइवेट स्कूलो में थे जबकि कनाडा में यह आंकड़ा 8% का था। भारत में सेकंड्री लेवल के 51% स्टूडेंट्स प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे थे। इसका अकेला कारण है कि भारत में ऐसे सरकारी स्कूलों की भारी कमी है जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा रही हो और जहां मूलभूत शैक्षिक सुविधाएं उपलब्ध हों। शिक्षकों एवं बुनियादी सुविधाओं के मामले में राज्य सरकार के स्कूल तो शर्मनाक स्तर तक आ गए हैं। ऐसे में टैक्सपेयर को टैक्स पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ उससे ऊंची दर से टैक्स वसूला जा रहा है तो दूसरी तरफ वह बच्चों की पढ़ाई पर भी भारी-भरकम रकम खर्च करने को मजबूर है। स्वास्थ्य सुविधाएं: यूएस-फ्रांस का मुकाबला नहीं अब स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी विचार कर लें। वर्ष 2016 में भारत में 64.6% लोगों ने इलाज का सारा खर्च खुद उठाया था। वहीं, कनाडा, यूएस और फ्रांस का यह आंकड़ा सिर्फ 15% है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का 2011 का आकलन बताता है कि 5 करोड़ से ज्यादा भारतीयों की प्रत्येक दिन की औसत क्रय क्षमता 55 रुपये की थी जो अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के आसपास है। दरअसल, स्वास्थ्य पर खर्चों के कारण भारतीयों की क्रय क्षमता इतने निम्न स्तर की होती है। शिक्षा-स्वास्थ्य पर खर्च से घटती है क्रय क्षमता वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों से पता चलता है कि शिक्षा पर जीडीपी के अनुपात में भारत सरकार का खर्च दुनिया के कई हाई टैक्स रेट वाले देशों के मुकाबले बहुत कम है। हां, यह भी सही है कि जीडीपी में केंद्र सरकार द्वारा जुटाए गए टैक्स की हिस्सेदारी महज 11.2% है जो फ्रांस और यूके जैसे देशों से बहुत कम है जहां यह आंकड़ा 20% से भी ऊपर है।


from Latest Business News in Hindi - बिज़नेस खबर, बिज़नेस समाचार, व्यवसाय न्यूज हिंदी में | Navbharat Times http://bit.ly/2XzVFdw
Previous Post
Next Post
Related Posts