जयश्री भोसले, पुणेदेश के विभिन्न हिस्सों के लोग जिन तारीखों पर अपने घर-आंगन, खेत-खलिहान में मॉनसूनी बारिश के आने का इंतजार करते हैं, उन्हें मौसम विभाग ने करीब 78 साल पहले तय किया था। हालांकि इतना समय बीतने के साथ ही जहां के लिए अब कहीं ज्यादा इंतजार करना पड़ रहा है, वहीं इसकी रुखसती भी देर से होने लगी है। इसे देखते हुए भारत का मौसम विभाग बदले हुए ट्रेंड के मुताबिक मॉनसून के आने और जाने की तारीखों में जल्द बदलाव करेगा। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम राजीवन ने कहा, 'मॉनसून के आने-जाने की तारीखों में बदलाव की जरूरत का अध्ययन कर रही समिति अपनी रिपोर्ट दो महीनों में फाइनल कर लेगी। ये तारीखें बदलने के बारे में हम जल्द निर्णय करेंगे। यह बदलाव अगले साल से किया जा सकता है।' इसके आने-जाने की तारीखें 1941 से मौसम से जुड़े अनुमानों में जस की तस उपयोग की जा रही हैं। राजीवन ने कहा, 'मुंबई के लोग 10 जून तक मॉनसून आने की उम्मीद करने लगते हैं, जबकि तब तक प्राय: वहां बारिश नहीं होती है।' इस साल मुंबई में 25 जून को मॉनसून पहुंचा था यानी शहर के लिए इसके आने की असल अनुमानित तारीख से 15 दिनों बाद। राजीवन ने नई तारीखें बताने से इनकार कर दिया क्योंकि रिपोर्ट अभी फाइनल नहीं की गई है। मौसम विभाग ये तारीखें बदलने के बारे में पिछले चार-पांच सालों से सोच रहा है। अभी केरल में मॉनसून पहुंचने की सामान्य तारीख 1 जून है, जबकि इसकी विदाई पश्चिमी राजस्थान से शुरू होती है जिसकी शुरुआत की तारीख 1 सितंबर है। हालांकि पिछले कई वर्षों से इन दोनों तारीखों को मॉनसून ने दगा दी है। खासतौर से इसकी विदाई में पिछले पांच वर्षों में तीन बार करीब एक महीने की देर देखी गई है, वहीं एक बार 15 दिनों की देर से यह विदा हुआ था। मौसम विभाग के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, 'मॉनसून के आने की भविष्यवाणी करना बहुत आसान है क्योंकि इसकी कुछ खास विशेषताएं साफ दिखती हैं। हालांकि इसकी वापसी का अनुमान लगाना कठिन है।' कृषि मंत्रालय का मानना है कि मॉनसून के आने-जाने की तारीखों में बदलाव से खेती-बाड़ी के तौर-तरीकों में अहम बदलाव करने में मदद मिलेगी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल अग्रिकल्चरल यूनिवर्सिटी के रिसर्च डायरेक्टर डॉ. मिथिलेश कुमार ने कहा, 'केरल में देरी से आगमन और उत्तर भारत में इसके और भी देरी से पहुंचने के कारण धान की खेती के आम शेड्यूल में बाधा आती है। पूरे देश में फसलों के पैटर्न पर असर पड़ता है। बुआई की तारीखों में बदलाव से किसानों को उसी के अनुसार सलाह देने में मदद मिलेगी।' कुमार ने कहा कि बिहार में किसानों को धान की कम समय में तैयार होने वाली किस्मों की खेती करने की सलाह दी जा सकती है, जिससे उन्हें रबी सीजन में गेहूं की खेती के लिए खेत खाली करने में आसानी हो सकती है।
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