दिवाला कंपनी में आएंगे बड़े बदलाव, बैंकों तय करेंगे कैसे होगा दिवालिया कंपनी से वसूले कर्ज का बंटवारा

नई दिल्ली कैबिनेट ने इनसॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड () यानी में बड़े बदलावों को मंजूरी दी है। इससे रेज़ॉलूशन प्रॉसेस को 330 दिनों में पूरा करना होगा। इसमें मुकदमेबाजी में लगने वाला वक्त भी शामिल है। कैबिनेट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि दिवालिया कंपनी से वसूली का पहला दावा बैंकों यानी फाइनैंशल क्रेडिटर्स का होगा। उनके बाद वेंडरों यानी ऑपरेशनल क्रेडिटर्स को तरजीह दी जाएगी। नैशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्राइब्यूनल (NCLAT) के एस्सार स्टील केस में एक हालिया आदेश से इस मामले पर भ्रम बन गया था। जिन रियल एस्टेट कंपनियों ने फ्लैट्स का पजेशन नहीं दिया है, दिवाला कानून के तहत उनके रेज़ॉलूशन में घर खरीदारों का पक्ष भी मजबूत बनाया गया है। इन संशोधनों पर अब संसद की मंजूरी लेनी पड़ेगी। माना जा रहा है कि मौजूदा सत्र में इसकी कोशिश हो सकती है। आईबीसी में कैबिनेट ने सात संशोधनों को मंजूरी दी। इनमें सबसे बड़ा फैसला दिवालिया कंपनी से कर्ज वसूली में बैंकों को वरीयता देना है। कंपनी से जो भी कर्ज वसूल किया जाएगा, अलग-अलग तरह के कर्जदाताओं के बीच उसके बंटवारे पर बैंकों का फैसला मान्य होगा। सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि वेंडरों (ऑपरेशनल) और जिन लोगों ने बिना कुछ भी गिरवी रखे कर्ज दिया है, उन्हें बैंकों के बराबर दर्जा नहीं दिया जाएगा। सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कैबिनेट के फैसलों के बारे में बुधवार को जानकारी दी। इससे पहले NCLAT ने एस्सार स्टील के लिए आर्सेलर मित्तल के 42 हजार करोड़ के रेज़ॉलूशन प्लान में बदलाव करते हुए कहा था कि कंपनी से जिन लोगों को पैसा लेना है, सबके साथ बराबरी का सलूक किया जाए। उसने कहा था कि इसमें सभी वर्गों के कर्जदाताओं के लिए 60.7 पर्सेंट वसूली सुनिश्चित की जाए। अपीलेट ट्राइब्यूनल के इस फैसले के कारण सरकार पर आईबीसी में जल्द बदलाव करने का दबाव बन गया था। एक बड़े सरकारी अधिकारी ने बताया, ‘हमारा मानना है कि NCLAT का आदेश इस कानून की भावना के मुताबिक नहीं था।’ इस फैसले को एस्सार स्टील को कर्ज देने वाले बैंकों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। अधिकारी ने बताया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट को भी बताएगी कि बैंकों और ऑपरेशनल क्रेडिटर्स को एक बराबर मानना ठीक नहीं होगा। कैबिनेट के कदम से उन रेज़ॉलूशन प्रॉसेस में तेजी आएगी, जो कई वजहों से लटके हुए हैं। सिरिल अमरचंद मंगलदास के मैनेजिंग पार्टनर सिरिल श्रॉफ ने कहा, ‘आईबीसी में संशोधनों को मंजूरी मिलना अच्छी खबर है। इससे रेज़ॉलूशन प्रॉसेस की कई अड़चनें दूर होंगी। इससे खासतौर पर वसूले गए कर्ज पर बैंकों की भूमिका स्पष्ट हो गई है। रेज़ॉलूशन प्लान को सभी पक्षों को मानना होगा।’ उन्होंने कहा कि इन बदलावों से निवेशकों का भरोसा भी बढ़ेगा। आईबीसी में किए गए एक बदलाव के मुताबिक अब रेज़ॉलूशन प्लान को केंद्र, राज्य और लोकल अथॉरिटी (जिसका कंपनी पर बकाया है) समेत सभी पक्षों को मानना होगा। अभी मुकदमेबाजी के कारण लोन रेज़ॉलूशन में देरी हो रही है। सरकार इसे खत्म करना चाहती है। इसलिए उसने 330 दिनों की समयसीमा तय की है और इसमें मुकदमेबाजी का समय भी शामिल है। अभी तक इसके लिए 270 दिनों की समयसीमा तय है, लेकिन मुकदमेबाजी के कारण प्रक्रिया काफी लंबी खिंच रही है। अगर 330 दिनों में रेज़ॉलूशन प्रॉसेस पूरा नहीं होता है तो दिवालिया कंपनी का लिक्विडेशन शुरू करना होगा। सरकार ने घर खरीदारों की ताकत भी बढ़ाई है। मान लीजिए कि दिवालिया रियल एस्टेट कंपनी के 100 घर खरीदारों में से आधे या उससे अधिक रेज़ॉलूशन प्लान के लिए वोट करते हैं तो माना जाएगा कि उन्होंने उसका समर्थन किया है। इससे जेपी इंफ्राटेक जैसे मामलों पर असर पड़ेगा।


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