पीओएस डेवाइस तो चीन से ही मंगाने पड़ेंगे, आखिर क्यों?

मुंबई सीमा पर चीन की हरकतों को देखते हुए देश में चीनी सामान के बहिष्कार (boycott call for chinese products) और चीन पर आयात निर्भरता कम करने के मांग उठी है। लेकिन बैंकिंग और पेमेंट्स सेक्टर को पेमेंट टर्मिनल यानी पॉइंट ऑफ सेल (पीओएस) के लिए चीन पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका किफायती विकल्प मौजूद नहीं है। देश में डिजिटल पेमेंट की मांग लगातार बढ़ रही है और मॉल तथा रिटेल स्टोरों में क्रेडिट और डेबिट कार्ड से लेनदेन के लिए इन स्वाइप मशीनों की अहम भूमिका है। सरकार ने कम करने की पहल की है जिसके बाद पेमेंट्स प्रोवाइडर चीन में बने पीओएस का विकल्प खोज रहे हैं। लेकिन इंडस्ट्री के सूत्रों का कहना है कि कीमत और लीगेसी चुनौतियों के कारण तुरंत किसी विकल्प को अपनाना मुश्किल होगा। क्यों अहम है पीओएस सरकार की फ्लैगशिप डिजिटल इंडिया पहल के तहत गांवों और कस्बों में बड़े पैमाने पर पीओएस की इस्तेमाल हो रहा है। आरबीआई ने ग्रामीण इलाकों में पीओएस को बढ़ावा देने के लिए मई में 250 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। इसमें खासतौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में इनका इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर दिया गया है। अभी देश में 95 फीसदी से अधिक पीओएस चीन से आयात होते हैं। इसमें दुनिया की तीन कंपनियों के दबदबा है। इनमें अमेरिका की वेरिफोन, फ्रांस की इनजेनिको और हॉन्ग कॉन्ग की पैक्स टेक्नोलॉजीज शामिल है। दूसरे देशों के मुकाबले चीन सस्ता इंडस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक इन तीनों कंपनियों की चीन में निर्माण इकाई है। इनकी कुछ इकाइयां ताइवान और दक्षिण कोरिया में भी है। ताइवान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम भी इन मशीनों का निर्यात करते हैं लेकिन उनकी कीमत चीन की तुलना में कम से कम 20 से 30 फीसदी अधिक है। इसकी वजह यह है कि इन देशों में उत्पादन कम है। पैक्स इंडिया के सीईओ संजीव संधू ने कहा कि दुनिया में 75 फीसदी से अधिक पेमेंट्स टर्मिनल का निर्यात चीन से होता है और यही वजह है कि मैन्यूफैक्चरर्स को वहां मशीनें बनाना सस्ता पड़ता है।


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