GST: अब भी वसूला जा रहा ग्रॉस पेमेंट पर ब्याज

सुधा श्रीमाली, मुंबई काउंसिल से महीनों पहले मिली छूट के बावजूद कई रियायतों का लाभ अभी तक कारोबारी नहीं ले पा रहे हैं और उन्हें रोजाना लाखों का नुकसान हो रहा है। नए अपडेट के साथ काउंसिल ने कहा था कि GSTR-3B में रिटर्न भरते वक्त जितना भी डिले होता है, उसमें कारोबारी से जितना पेमेंट शॉर्ट हुआ है, उस पर ब्याज लिया जाए, न कि ग्रोस पेमेंट पर। इस पर काउंसिल का नोटिफिकेशन भी आया, लेकिन अभी तक यह कानून लागू नहीं हुआ है। गौरतलब है कि जीएसटी देयता के विलंबित भुगतान पर ब्याज से संबंधित संशोधन से करदाताओं के लिए एक बड़ी राहत सामने आई थी और कारोबारियों ने चैन की सांस थी। चैंबर्स कर रहे विरोध हिंदुस्तान चैंबर ऑफ कॉमर्स के सदस्य परमेश्वर टपारिया कहते हैं, ‘उदाहरण के लिए अगर बैंक 1 करोड़ रुपये तक की ओवरड्राफ्ट सुविधा देती है तो कारोबारी से उस पूरी राशि पर इंटरेस्ट नहीं लेती है बल्कि जितनी सुविधा कारोबारी ने इस्तेमाल की होती है, उस पर ही इंटरेस्ट लिया जाता है। अगर 20 लाख ही उपयोग में लिए हैं तो उसी पर कारोबारी को इंटरेस्ट देना होता है। लेकिन जीएसटी में अगर उदाहरण के लिए 1 करोड़ रुपये गलत क्रेडिट भर दिया है और इस्तेमाल में 10 लाख रुपये ही आया है, लेकिन इंटरेस्ट पूरे 1 करोड़ पर आपको देना होगा जबकि पैसा डिपार्टमेंट में ही पड़ा होता है।’ वहीं भारत मर्चेंट चैंबर के ट्रस्टी राजीव सिंगल का मानना है कि जो राशि इस्तेमाल में ही नहीं ले गई है, उस पर इंटरेस्ट लेने का कोई मतलब ही नहीं है। एक अन्य कारोबारी ने बताया कि गलत इनपुट क्रेडिट ले लिया है तो इंटरेस्ट तो पेएबल होगा लेकिन अगर वह बुक में ही पड़ा रहा, न कि पेमेंट के लिए इस्तेमाल हुआ, तो ऐसे में पूरी राशि पर इंटरेस्ट देना अखर रहा है। ‘रिटर्न भरने में जितनी देरी हुई हो, उसमें प्रति दिन के हिसाब से इंटरेस्ट अदा करना होता है और इंटरेस्ट केवल जीएसटी की शुद्ध नकदी देयता पर लागू होता है। हालांकि काउंसिल ने नोटिफिकेशन लाकर यह साफ कर दिया था कि इंटरेस्ट शॉर्ट पेमेंट पर लिया जाए न कि पूरी राशि पर, लेकिन जब तक यह लागू नहीं होता कारोबारियों को नुकसान होगा।’ - सीए मनीष गाडिया ‘कर देनदारी के विलंबित भुगतान पर ब्याज को टैक्स के भुगतान के सभी तरीकों पर लगाया जाता है, भले ही वास्तविक नकद का भुगतान नहीं किया गया हो, लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट का उपयोग किया गया है। अगर टैक्सपेयर के पास लायबिलिटी सेट-ऑफ करने के लिए आईटीसी था तो यह मुश्किल पैदा कर देता है।’ - अर्चित गुप्ता, फाइंडर क्लियर टैक्स


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