...तो ट्रेड वॉर के कारण चीन से शिफ्ट होने वाली कंपनियों को भारत लाने के लिए घटाया कॉर्पोरेट टैक्स!

योगिमा शर्मा, नई दिल्ली सरकार ने नई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए 15 प्रतिशत के कॉर्पोरेट टैक्स की घोषणा की है। इसका मकसद चीन में काम करने वाली उन कंपनियों को लुभाना है, जो अमेरिका के साथ चल रहे व्यापार युद्ध के कारण कहीं और शिफ्ट होना चाहती हैं। जानकारों ने सरकार के इस कदम की तारीफ तो की है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि इस मकसद को हासिल करने के लिए और उपाय करने होंगे। सेस और सरचार्ज के साथ ऐसी कंपनियों को 17 प्रतिशत का टैक्स चुकाना पड़ेगा। इस पहल के साथ भारत में मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए टैक्स वियतनाम और म्यांमार जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बराबर हो जाएगा। इन देशों में 15 से 20 प्रतिशत का टैक्स कंपनियों पर लगता है। पिछले एक साल में ऐपल, डेल और एचपी सहित 50 से अधिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से आंशिक तौर पर निकली हैं या अपना प्रॉडक्शन बेस किसी अन्य देश में शिफ्ट कर रही हैं। यहां तक कि चीन की मल्टीनेशनल इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी टीसीएल के भी टीवी प्रॉडक्शन को वियतनाम शिफ्ट करने की खबरें आई हैं। चीन की साइलुन टायर भी मैन्युफैक्चरिंग थाइलैंड ले जा रही है। इस मामले में क्रिसिल के प्रिंसिपल इकनॉमिस्ट डीके जोशी ने कहा, ‘नई कंपनियों के लिए 15 प्रतिशत का कॉर्पोरेट टैक्स बहुत बड़ी रियायत है। जो कंपनियां चीन से भारत आना चाहती हैं, उनके लिए यह मध्यम अवधि में निर्णायक साबित होगा।’ अभी और बहुत कुछ करना है उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को अभी कारोबारी सुगमता बढ़ाने के लिए बहुत कुछ करना है क्योंकि इस मामले में दूसरे देश भारत से काफी आगे हैं। हाल में आई खबरों से पता चला कि अमेरिका-चीन के व्यापार युद्ध का अधिक लाभ वियतनाम, ताइवान, थाइलैंड और मलयेशिया जैसे देशों को मिला है, न कि भारत को। यह बात हैरान करने वाली है क्योंकि भारत का घरेलू मार्केट इन देशों की तुलना में बहुत बड़ा है। जानकारों का कहना है कि अपर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर, जमीन खरीदने में देरी, सख्त श्रम कानून और ऊंची टैक्स दरों के कारण भारत के बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियां दूसरे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में प्लांट लगाना पसंद करती हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन बिबेक देबरॉय ने कहा, ‘मेक इन इंडिया मुख्यतौर पर मैन्युफैक्चरिंग के बारे में है, जो जमीन अधिग्रहण और श्रम सुधारों जैसी कई चीजों पर निर्भर करता है। भारत में जमीन राज्य के अधिकारक्षेत्र में आता है। श्रम का मामला भी ऐसा ही है। हमें इन सब चीजों को मिलाकर देखना होगा।’


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