मुंबईवॉल स्ट्रीट के जानेमाने इन्वेस्टमेंट बैंक रहे लीमैन ब्रदर्स के 11 साल पहले ध्वस्त होने का साया दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों पर बना हुआ है। लीमैन ब्रदर्स का बोरिया-बिस्तर बंधने के चलते तमाम बाजार पस्त हो गए थे और दुनिया की अर्थव्यवस्था महामंदी के बाद के सबसे भीषण संकट में फंस गई थी। 1929 की महामंदी के बाद यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संकट था। लिक्विडिटी का सहारा तब केंद्रीय बैंकों ने अपनी अर्थव्यवस्थाओं को सब-प्राइम क्राइसिस से उबारने के लिए मुख्य तौर पर लिक्विडिटी को अहम जरिया बनाया था। करीब एक दशक बाद भी ये बैंक उसी नुस्खे से काम चलाते दिख रहे हैं। ज्यादातर केंद्रीय बैंकों की बैलेंस शीट नहीं घटी है वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों की बैलेंस शीट $25 लाख करोड़ की है। यह साल के समय की तुलना में चार गुना ज्यादा है। बीते दशक में अमेरिका को छोड़कर किसी भी OECD देश के केंद्रीय बैंक ने अपनी बैलेंस शीट का साइज नहीं घटाया है। ग्लोबल सेंट्रल बैंक बैलेंस शीट करीब 25 ट्रिलियन डॉलर की है। यह 2008 में उभरे दैत्याकार वित्तीय संकट के वक्त से करीब चार गुना है। पिछले एक दशक में अमेरिकी फेडरल रिजर्व को छोड़कर ऑर्गनाइजेशन फॉर इकनॉमिक कोऑपरेशन ऐंड डिवेलपमेंट (OECD) के तहत आने वाले किसी भी देश का केंद्रीय बैंक अपनी बैलंस शीट का आकार घटा नहीं सका है। बॉन्ड खरीदारी अर्थव्यवस्थाओं की हालत अब भी खराब होने और इंफ्लेशन के निचले स्तर पर बने रहने को देखते हुए केंद्रीय बैंकों ने बॉन्ड खरीदारी में ढिलाई नहीं बरती है ताकि ग्लोबल इकनॉमी को सहारा दिया जा सके। लीक से हटकर परंपरागत रणनीतियों से कुछ खास फायदा होता न देख केंद्रीय बैंकों ने लीक से हटकर भी कदम उठाए हैं। मसलन, उन्होंने ब्याज दरों को नेगेटिव की हद तक गिरा दिया है ताकि कंजम्पशन को बढ़ाया दिया जा सके।
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