हर शख्स को मिले 1 डॉलर ज्यादा तो 6% हो जाएंगे सूइइसाइड: स्टडी

मैथिली अय्यर, मुंबई न्यूनतम आय में चंद रुपयों की बढ़ोतरी की दर को 6 फीसदी तक कम कर सकती है। एक अमेरिकन स्टडी के मुताबिक, अगर न्यूनतम आय में एक डॉलर यानी 72 रुपये जोड़ दिए जाएं तो अमेरिका में सूइसाइड की सालाना दर में 6 पर्सेंट की कमी आ सकती है। यह स्टडी नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो 2018 डेटा आने से कुछ दिनों पहले आई है, जिसमें यह खुलासा हुआ है कि भारत में गरीबों द्वारा हुए हर 10 सूइसाइड्स में से 7 की आय 1 लाख रुपये सालाना से कम थी। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सूइसाइड के मामलों में सोशल व इन्वाइरन्मेंटल वजहों को कम नहीं आंकना चाहिए। ये फैक्टर्स भी मानसिक स्वास्थ्य जितना ही महत्व रखते हैं। PGIMER, चंडीगढ़ में इंडियन जरनल ऑफ सोशल साइकायट्री के एडिटर व प्रफेसर डॉ. देबाशीष बासु ने कहा, सूइसाइड के लिए उकसाने वाले कारकों में सामाजिक वजहें ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा, सामाजिक व आर्थिक कारण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। मानसिक स्वास्थ्य नीति जरूरीः एक्सपर्ट्स पिछले सप्ताह इंडेक्स्ड जर्नल ऑफ एपिडेमियॉलजी ऐंड कम्युनिटी हेल्थ में छपी 25 साल की अमेरिकी स्टडी के मुताबिक, 1990 से 2015 के बीच हर स्टेट में न्यूनतम वेतन में 1 डॉलर का इजाफा करने से करीब 27000 जिंदगियां बचाई जा सकती थीं। वहीं, 2 डॉलर का इजाफा कर इस दौरान 57,000 सूइसाइड रोके जा सकते थे। ब्जाली की बात करें तो साल 2003 में बोल्सी फैमिलिया प्रोग्राम की शुरुआत की गई थी। इस प्रोग्राह के तहत कम आय वाले परिवारों को कैश ट्रांसफर का प्रवाधन था। यह फायदा इस शर्त पर दिया जाता था कि वे अपने बचचों को स्कूल भेजेंगे और समय पर वैक्सीन दिलवाएंगे। पिछले साल मई के महीने में सोशल साइकायट्री ऐंड सायकायट्रिक एपिडेमॉलजी में छपी स्टडी के मुताबिक, ऐसे निकाय जहां लोगों के पास ज्यादा कैश ट्रांसफर रहुआ, वहां तीन साल के बाद सूइसाइड की दर मों कमी देखने को मिली। पुणे में साइकायट्रिस्ट सौमित्र पठारे का कहना है, सूइसाइड इंटरसेक्टोरल (जिसका संबंध कई बातों से हो) समस्या है, मानसिक स्वास्थ्य तो महज एक पहलू है। उन्होंने आगे कहा, 'वर्बल अटॉप्सीज को देखें तो सूइसाइड करने वालों में से 50 पर्सेंट लोगों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या या सिमटम नहीं दिखाई दिया।' यह दुर्भाग्य की बात है कि भारत में किसानों की को सामाजिक इशू माना जाता हगै और गैर-किसानों के सूइसाइड को मानसिक स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है। मनोचिकित्सक ने कहा, 'हम इस जरूरी तथ्य को अनदेखा कर देते हैं कि सूइसाइड का संबंध सामाजिक और मानसिक स्थिति, दोनों से हो सकता है।' पठारे कहते हैं कि नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप की जरूरत है ताकि सूइसाइड पर लगाम लगाई जा सके।


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